
कभी कभी जब अकेले रोती हूँ
तो रातो को भी तेरा इंतज़ार करती हूँ
कभी कभी, जब अकेले में सोती हूँ
तो खुद की उंगलियों से यु सिलवटे तेरी बना जाती हूँ
तेरे बाहों में सिमटना चाहती हूँ
कुछ देर ही सही, तुजसे दिल का हर राज़ कहना चाहती हूँ.
तू समझता नहीं मेरी प्यास को
तू बस जलना जनता है
तू कभी आता नहीं बेवजह बेवक़्त रात को
तू सिर्फ जलाना जो जनता है.
कुछ और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #12



Leave a reply to DeepikasRamblings Cancel reply