Category: Just when I don’t know anything.
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सूरज से गुफ्तगू #33
तेरे कंधे पर सर रख कर रोना चाहती हूँतुजे बाहो में भर कर कुछ देर सोना चाहती हूँफिर जल के राख हो जाऊं तो भी कोई गम नहींबस तेरे सीने में भी खुद की पहचान छोड़ना चाहती हूँतेरी उंगलियों के बीच खुद की उंगलियां पिरोना चाहती हूँतेरे सपनो में मेरी…
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सूरज से गुफ्तगू #32
वो कहते है वक़्त बड़ा तेज़ हैंशायद उन्होंने कभी सारी रात उस चाँद को नहीं देखा हैंशायद उन्होंने अकेले में बिस्तर पर सिलवटों को नहीं सजाया हैंशायद, शायद उन्होंने उन तारो को तांकते हुए तुम्हारा इंतज़ार नहीं किया हैं Read More: सूरज से गुफ्तगू #31
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सूरज से गुफ्तगू #31
सुन तू चला जामैं हक़ीक़त में जीना चाहती हूँख्वाब बहुत देख लिए मैंनेअब उन्हें जुड़ते देखना चाहती हूँउन्हें टूटने नहीं देना चाहती हूँसुन तू चला जामधुशाला में खोना नहीं चाहती हूँमें शायद बस कड़वे घूट ही पीना जानती हूँ #amorfati :Amor fati is a Latin phrase that may be translated…
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सूरज से गुफ्तगू #30
जो देखना चाहता है तो देख लेता हैवरना न जाने कहा छुप जाता हैमै इंतज़ार करती हूँ की तू अब आएगापर तुजे न जाने मुझे यु परेशां देख, क्या चैन आता है. Read More: सूरज से गुफ्तगू #29
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सूरज से गुफ्तगू #29
तू आया तो है फिर से आजपर तू सवेरा नहीं, अँधेरा लाया हैक्या बात हुई, क्या कोई बात अधूरी छूटिया फिर बस मेरे अंदर का अन्धेरा तुज पर भी छाया हैं Read more: सूरज से गुफ्तगू #28
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सूरज से गुफ्तगू #28
बिन मांगी जलन हैएक तूफ़ान, एक सैलाब भी हैरोज तुजसे पूछना चाहती हु, पर भूल जाती हूँतू है तो सही पर इतना दूर दूर क्यों हैं Read More: सूरज से गुफ्तगू #27
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सूरज से गुफ्तगू #27
न देखु तुजेतो ज़िंदा ही रहती हूँन देखु तुजेतो वफ़ात से न मिल पति हूँन देखु तुजेतो उन गैरो में भी तुजे ही ढूंढ़ती हूँन देखु तुजेतो बस गुमसुम सी रहती हूँन देखु तुजेतो शोर में भी ख़ामोशी ढूंढ़ती हूँअब क्या बताऊ न देखु तुजेतो किसी बात का गम नहीं…
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सूरज से गुफ्तगू #26
अब दूर दूर बैठ कर बातें नहीं होंगीअब तो मुलाकाते होंगीअब बेज़ुबान रात नहीं होंगीअब तो सन्नाटो में भी शरारत होगीबहुत रो ली मेरी आँखे तेरे बगैरबहुत तोड़ लिया अपना दिल, तूने मेरे बगैरतनहा न तू होगा न अब मैंशायद इसलिए, ए सूरज, आया है अब अपना समयअब सिर्फ आँखों…
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सूरज से गुफ्तगू #25
खुदको समजा लिया हैतुझको मना लिया हैइकरस जितना ऊंचा नहीं उड़ेंगेहम दोनों जितना बटोर सके उसी में खुश हो लेंगेज्यादा ख्वाहिशे नहीं रखेंगेवरना शायद दो जिस्म एक जान जैसा कुछ खो देंग। Read More: सूरज से गुफ्तगू #24
