
चलो जाओ, नहीं करनी तुमसे कोई मुलाकात
तुम नहीं चाहते तो नहीं करनी तुमसे कोई बात
दूर-दूर ही अच्छे हो
चाँद क बिना ही पुरे हो.
शायद इसी बात का गुर्रर है
चांदनी से पहले जो तुमसे मोहब्बत का इकरार किया है.
हमने तो कोई पर्दा न रखा था
पर तुम्हारे सुरूर का ताप ही गहरा था.
चल आज से सब बदल जायेगा
तेरी जगह चाँद का नाम लिया जायेगा
आज से रात को ही सपने देखेंगे
सौंदर्य की जगह चांदनी को दे देंगे
बोल अगर है तुजे मंजूर
या फिर है तुजे मेरी ही मोहब्बत कबूल?
PS: However cliche this may sound anyone saying Kabool, kabool, kabool will not be entertained.

थोड़ी और गुफ्तगू : सूरज से गुफ्तगू #5



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