
क्या यार तुम आज फिर चुप गये
देखो ये रोज रोज का रूठना मनाना नहीं चलेगा
तुम्हारा रोज यु हमसे दूर जाना नहीं चलेगा.
हमने तो कभी कहा नहीं की हमे बारसात पसंद है
हमे तो तुम्हारी वो दूर से भेजी रंगीन आहट ही पसंद है
हमने कब कहा की हमे वो पेड़ से टूट ते पत्ते पसंद है
हमे तो वो ढलती शाम के बेहतरीन बादल ही पसंद है
हमने कब कहा की हमें वो कीचड़ में छप-छपाये पैरों के निशाँ पसंद है
हमे तो तुम्हे देख कर शर्म से लाल होना ही पसंद है.
थोड़ी और गुफ्तगू: सूरज से गुफ्तगू #6



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