आज जाते वक़्त बार बार पीछे मुड़ के देख रही थी
की शायद तुम्हारी एक जलक और दिख जाये
वक़्त से बार बार मिन्नतें कर रही थी
की काश थोड़ा सा वक़्त और मिल जाये
यु तो खफा थी मै तुजसे
पर मोहब्बत-ऐ-वफ़ा का आलम कोई कैसे भूल जाये
Read More: सूरज से गुफ्तगू #37

आज जाते वक़्त बार बार पीछे मुड़ के देख रही थी
की शायद तुम्हारी एक जलक और दिख जाये
वक़्त से बार बार मिन्नतें कर रही थी
की काश थोड़ा सा वक़्त और मिल जाये
यु तो खफा थी मै तुजसे
पर मोहब्बत-ऐ-वफ़ा का आलम कोई कैसे भूल जाये
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Thank you so much for reading, though I must admit that some don’t even make sense to me anymore.
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